presser to wife with stranger

Written by: tanudholkia
Category: Wahre Geschichte




मैं पिछले कुछ दिनों से अन्तर्वासना नियमित रूप से पढ़ती हूँ। बहुत बार मुझे लगता था कि ये सब कहानियाँ सच नहीं होती। ज्यादातर कहानियाँ सिर्फ मर्दों ने लिखी हुई हैं। बहुत दिनों से सोच रही थी कि कभी मैं भी अपना अनुभव आप लोगों को सुनाऊँ।

और मैं अपमी बाकी सहेलियों को भी विनती करूंगी कि वो भी अपने अनुभव कथन करें।

मेरा नाम रजनी है, 32 साल की हूँ, मेरी शादी 10 साल पहले हुई थी। वैसे तो मैं एक छोटे शहर से हूँ लेकिन शादी के बाद अपने पति के साथ मुंबई में रहती हूँ। मेरे पति रमेश एक कंपनी में सुपरवाइज़र हैं। हम लोग मुंबई में एक चॉल के एक कमरे में रहते हैं।

यह बात करीब नौ साल पहले की हैं, हमारी शादी को करीब डेढ़ साल हो गया था। जैसे कि हर शादीशुदा जोड़े का होता है, शादी के पहले साल में सेक्स के अलावा कुछ भी नहीं सूझता, मेरे पति को और मुझे भी। जब भी मौका मिलता, हम लोग चुदाई में लग जाते थे। उनकी ड्यूटी शिफ्ट में होती थी इसलिए सेक्स के लिए वक़्त की भी कोई पाबन्दी नहीं थी, जब भी उनका मूड होता था, वो शुरू हो जाते थे। कई बार छुट्टी के दिन तो वो मुझे अन्दर कुछ भी पहनने को भी मना करते थे, ताकि चुदाई करने में कोई वक़्त न डालना पड़े।

कभी कभी वो ब्लू फिल्म की सीडी लाते थे, वो देखने के बाद चुदाई और भी जोर से होती थी। शादी से पहले मुझे सेक्स के बारे में इतना कुछ पता नहीं था लेकिन बम्बई में आने के बाद कुछ ज्यादा ही पता चल रहा था। हम लोग कभी चौपाटी या दूसरे किसी समुन्दर किनारे घूमने गए तो वह बैठे जोड़ों को देख कर कुछ अजीब सा लगता था, लेकिन रत में चुदाई के वक़्त उसके बारे में सोचा तो बड़ा मज़ा आता था।

एक साल की ऐसी मस्त सेक्सी जिंदगी के बाद, सब रोजमर्रा जैसा काम सा लगने लगा था। मुझे सेक्स में इतना मज़ा नहीं आ रहा था। हाँ, चुदाई होती थी लेकिन उनका मन रखने के लिए। जब भी वो मूड में होते थे, मैं न नहीं कहती थी, टाँगें फैला कर लेट जाती थी और वो लग जाते थे।

थोड़े दिनों के बाद जब मेरा मूड नहीं होता था तब मैं कभी कभी मना भी करती थी। कभी कभी वो मान जाते थे। वो भी तरह तरह से मुझे गर्म करने की कोशिश करते थे। कभी गर्म होती थी कभी नहीं। कभी कभी चुदाई के वक़्त वो अपने दोस्तों के बारे में, उनकी बीबियों के बारे में बातें करते थे। पहले तो मुझे उन पर बहुत गुस्सा आता था। लेकिन बाद में सोचा कि अगर उनको ऐसी बातों से मज़ा आता हैं तो क्यों नहीं।

उन्हीं दिनों हम लोगो ने एक अंग्रेज़ी मूवी देखी। नाम तो याद नहीं लेकिन उसमें भी मिंया-बीबी होते हैं जिनकी कल्पनाओं की एक सूचि होती हैं और वो एक-एक कल्पना पूरी करते जाते हैं।

उस रात चुदाई के वक़्त रमेश ने कहा- क्यों न हम भी ऐसी एक सूचि बनायें और उसे पूरी करने की कोशिश करें !

पहले तो मुझे यह कुछ अजीब सा लगा लेकिन उनके बार-बार कहने पर मैं मान गई क्योंकि जब मैं भी गर्म मूड में होती हूँ तब ऐसी सब बातें अच्छी लगती हैं।

उन्होंने पूछा- तुम्हारी काल्पनिक लालसाएँ क्या हैं?

लेकिन मैं कुछ भी नहीं बोली। उन्होंने बड़ी कोशिश की लेकिन मैंने कुछ भी नहीं बताया। कई बार पूछने के बाद भी मेरे न बोलने से उन्होंने पूछना छोड़ दिया।

अगली बार जब हम लोग चोदने के बारे में सोच रहे थे तब उन्होंने अपना लण्ड मेरे हाथ में थमाया और कहने लगे- तुम्हें कैसा लगेगा अगर कोई बड़ा मोटा काला लंड तुम्हारे हाथ में हो?

मुझे उनका ऐसा कहना कुछ अजीब सा लगा। कुछ गुस्सा भी आया, सोचा कि यह कैसा मर्द हैं जो दूसरे किसी का लंड अपनी बीबी के हाथ में देने की बात कर रहा है। लेकिन मन ही मन में उस बारे में सोच कर अच्छा भी लगा लेकिन मैंने कुछ भी नहीं बताया।

वो बोलने लगे- तुम्हें इतना सोचने की जरुरत नहीं है। देखो, मैं चाहता हूँ कि मैं दूसरी किसी औरत को चोदूँ। मुझे मेरे बहुत सारे दोस्तों की बीवियाँ अच्छी लगती हैं। और भी पड़ोस वाली बहुत सारी औरतें हैं जिन्हें चोदने की मेरी इच्छा हैं। तो फिर अगर तुमको लगता है कि किसी और से चुदवा लूँ तो उसमे गलत क्या है?

वो जो कह रहे थे ठीक था। लेकिन असल में ऐसा कुछ करना मुझे ठीक नहीं लगता था।

मैंने कहा- तुम्हें जो लगता है, वो लगने दो लेकिन मुझे उसमें कोई रुचि नहीं है।

बात यही पर नहीं रुकी।अगली बार से जब भी मौका मिलता, वो इस बात का जिक्र करते और मैं मना करती। उनको लगता कि मैं थोड़ी खुल जाऊँ। शायद मुझे किसी और से चोदने के ख्याल से उन्हें बड़ा मज़ा आता था। या शायद, अगर मैं किसी और से चुदवाने के लिए तैयार हो गई तो उनको किसी और औरत को चोदने का मौका मिल जायेगा। शायद वो मुझे अपराधी महसूस करवाना चाहते थे पता नहीं।

ऐसे ही बहुत बातों के बाद आखिर में मैं इस बात के लिए मान गई कि मैं कुछ अंग-प्रदर्शन करूँ जब जब मौका मिले और वो भी दूसरी औरतो के बारे में गन्दी बाते करें। अगर मुझे लगा तो मैं भी दूसरे मर्दों के बारे में बोलूँ या दूसरों के बारे में हम लोग बेझिझक बातें करें, दोनों के बीच में कोई बंधन न रहे। संक्षेप में हम एक दूसरे के सामने बेशर्म हो कर बातें करें।

जब कभी हम लोग बाहर घूमने जाते, मैं थोड़ा मेकअप करती, इनके कहने पर मैंने दो तीन गहरे गले के ब्लाऊज़ भी सिला लिए थे। कभी कोई शादी या ऐसी कोई उत्सव में जाते वक़्त मैं भी गहरे गले के ब्लाऊज़ पहनने लगी। मुझे भी मज़ा आने लगा था। अगर कोई मेरी तरफ देखे तो मुझे भी अच्छा लगने लगा था।

शायद रमेश भी इस ख्याल से गर्म होता था। उस रात जब चुदाई होती थी, तब वो बोलता- वो आदमी कैसे घूर कर तुम्हारी तरफ देख रहा था। शायद तुम्हें याद करके अब मुठ मार रहा होगा।

मुझे भी ऐसी बातें अच्छी लगने लगी। मैं भी बोलती- हाँ ! मुझे भी ऐसा ही लगता है। अगर वो वाला आदमी मिल जाये तो उससे मस्त चुदवा लेती ! वो मुझे मस्त चोदता ......!

रमेश की हालत देखने लायक होती थी। शायद वो डर जाता था कि कहीं मैं सच में तो किसी से चुदवा तो नहीं रही? वो लाख छुपाना चाहे लेकिन उसके चेहरे पर साफ़ दिखाई देता था। लेकिन फिर कभी वो दूसरे मर्द के बारे में बात करने लगे तो मैं एकदम गुस्सा हो जाती थी। उसे भी समझ में नहीं आता कि यह अचानक फिर क्या हो गया? लेकिन तब उसके चेहरे के ऊपर की चिंता गायब दिखाती थी।

मैं भी मन ही मन में किसी और से चुदवाने के बारे में सोचने लगी थी। कोई हट्टा-कट्टा मर्द दिखाई दे तो लगता था- काश यह मुझे मिले और मैं इसके साथ मस्त चुदाई करूँ।

कभी कभी इसी ख्याल में मेरी चूत गीली हो जाती थी मैं भी मौके की तलाश में थी और वो अचानक मेरे हाथ आ गया।

हुआ यूँ कि -

अपनी कंपनी के किसी काम से रमेश आठ दिन के लिए बाहर गया था। इसलिए मैं आठ दिन की भूखी थी। ऊपर से जब भी उसका फ़ोन आता वो ऐसी ही कुछ उल्टी-सीधी बातें करके मूड गर्म बनाता था। मन में बहुत सारी योजनाएँ भी बना कर रखी थी कि जब वो वापस आयेगा तब क्या करुँगी ! कैसे करुँगी !

हम जहाँ पर रहते थे, उसके ठीक सामने वाले बगल वाले घर ...

बगल वाले घर में क्या हुआ, यह अगले भाग में पढ़िए !





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